विभागों की अनदेखी से होते जा रहे तालाबों पर अवैध कब्जा
-बचे खुचे तालाबों को स्थानीय लोगों द्वारा कूड़ा डाल कर पाटा ही नहीं बल्कि घरों का गंदा पानी पाइपों के जरिए भरा जा रहा है
- कब्जों के कारण आने वाली बरसात पानी का नही किया जा सकेगा एकत्र
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर | कानपुर नगर तथा आसपास के क्षेत्रों में विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही के चलते पानी को सहजने वाले तालाबों पर लगातार कब्जे किए जा रहे है। कानपुर में कल्याणपुर, कल्याणपुर कल, रावतपुर, आवास-विकास, मिर्जापुर, यशोदानगर, बारासिरोही, बार्रा, न्यू आजाद नगर, सतबरी सहित कई स्थानों पर तालाबों की स्थिति दयनीय हो चली है। दलालों और विभागीय कर्मचारियों की सांठ-गांठ के चलते तालाबों को भराकर अवैध कब्जे कराये जा रहे है। शहर में लागतार पानी का स्तर नीचे जा रहा है। जहां पहले 70 से 80 फट पर पानी मिल जाता था वहीं अब 15 फुट से अधिक बोरिंग करानी पड़ रही है। शहर में तालाबों की स्थिती बहुत खराब होती जा रही है। तालाबों पर एक ओर तो कब्जे जोते जा रहे है, तो दूसरी ओर उन्हे कूड़ा और गंदे पानी का टैंक बनाया जा रहा है। अधिकारी मौन है, इस कारण बारिश के पानी का भी भण्डारण नही हो पा रहा है। बताते चले कि शहर में रामादेवी, सतबरी, न्यू आजाद नगर, रावतपुर, आवास-विकास जैसै कई स्थानो पर बडे तालाब है लेकिन अधिकांश उन पर कब्जा हो चुका है। दलाल तालाब की जमीनों को फर्जी कागजातों के सहारे बेच रहे है। अफसरों की लापरवाही से तालाबों की जमीनों पर बहुमंजिला इमारते बनती जा रही है। इसके बाद भी कब्जे बढ़ते जा रहे है। सतबरी गांव में कई तालाबों पर लागों ने कब्जाकर मकान खड़े कर लिया है। तालाबों का आस्तित्व संकट में आ चुका है। तालाब का पानी पीने के लिए ही नहीं बल्कि जमीन के अन्दर पानी का संतुलन बनाये रखने में सहायक होते है। वहीं गांवों में देखा होगा कि जहां तालाबों में पानी होता है उसमें मछली पानी, कमल गट्टा व सिंघाड़ा आदि का उत्पादन भी किया जाता है। तालाबों में कारण मिटटी में नमी बनी रहती है, जिससे तालाब के आसपास औषधी गुणों के पौधे स्वतः ही पैदा होत है। जमीन में पानी का स्तर कम होने के कारण शहर की 95 प्रतिशत कुओं का भी पानी सूख चुका है। नगर में कुल 136 तालाब है जिसमें 80 प्रतिशत तालाबों पर कब्जे किए जा चुके है। लोग इसके प्रति नाराज तो है लेकिन जागरूक है। शहर में कोई नए तालाब नही है। यह बहुत पुराने और ऐतिहासिक है। अब संभलने और प्रशासन द्वारा कार्यवाई का समय आ चुका है। यदि अब भी ध्यान नही दिया गया तो आने वाले समय में शहर को भीषण जल संकट का समना करना पड़ सकता है। सूखे पड़े हैण्डपंप कैसे बुझेगी प्यास बुझती कानपुर शहर में एक बड़ी समस्या और है जो कई वर्षाे से बढ़ती जा रही है। शहर के अधिकांश हैण्डपंप सूख चुके है। जो चल रहे है उन्हे भी स्थानीय लोगों ने अपने खर्चे पर चला रखा है। मई-जून की चिलचिलाती गर्मी में जब राहगीर पानी ढूंढता है तो उसे कही की रोड पर पानी की व्यवस्था नही मिलती। मजबूर होेकर या तो वह पानी खरीद कर पीता है या फिर फलों का जूस, गन्ने का रस, शिंकजी आदि का सहारा लेता है। बाहरी शिंकजी और पाउच वाला पानी पाने से संक्रमण का खतरा बना रहता है। लोगों का तो यहां तक कहना है कि यह सब विभागीय सांठ-गांठ है कि हैंण्डपंप ठीक नही कराये जा रहे है, ताकि कम्पनियों की पानी की बोतलों की बिक्री हो सके।