एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने स्तनपान को जन-आंदोलन बनाने का किया आह्वान
- स्तनपान कराने की राष्ट्रीय दर 63.7 प्रतिशत से घटकर 55.8 प्रतिशत हुई- माँ का दूध बच्चे के लिए साबित होता है पहला टीका
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर। विश्व स्तनपान सप्ताह के उपलक्ष्य में एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, कानपुर द्वारा शुक्रवार को जी.एस.वी.एम. मेडिकल कॉलेज, कानपुर के बाल रोग विभाग, में एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। प्रेस वार्ता को एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, कानपुर के अध्यक्ष डॉ. जे. के. गुप्ता, सचिव डॉ. शैलेन्द्र गौतम, प्रो. डॉ. अरुण आर्य तथा डॉ. अमितेश यादव ने संबोधित किया। उन्होंने वार्ता के दौरान बताया कि वर्ष 2026 की थीम (बे्रस्टफीडिंग फाॅर ए सस्टेंएबल स्टार्ट इन लाइफ स्टेªंथ व्हाॅट् वर्क) है। इसका उद्देश्य प्रत्येक नवजात शिशु को जीवन की सर्वोत्तम शुरुआत प्रदान करना, माताओं को स्तनपान के लिए सक्षम बनाना तथा समाज में स्तनपान के प्रति सकारात्मक वातावरण तैयार करना है। इस अवसर पर एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, कानपुर ने विश्व स्तनपान सप्ताह के अंतर्गत 1 से 7 अगस्त 2026 तक आयोजित किए जाने वाले विभिन्न जन-जागरूकता कार्यक्रमों की घोषणा भी की। डॉ. जे. के. गुप्ता ने कहा कि माँ का पहला गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) शिशु का पहला टीका है। यह संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करता है तथा शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करता है। उन्होंने कहा कि जन्म के पहले एक घंटे के भीतर स्तनपान प्रारम्भ करना, पहले छह माह तक केवल माँ का दूध देना तथा छह माह के बाद उचित ऊपरी आहार के साथ दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखना प्रत्येक परिवार का लक्ष्य होना चाहिए। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों मुताबिक भारत में जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान प्रारम्भ कराने की दर 41.8 प्रतिशत से बढ़कर 50.1 प्रतिशत हुई है, जो सकारात्मक संकेत है। लेकिन चिंता का विषय यह है कि छह माह तक केवल स्तनपान कराने की राष्ट्रीय दर 63.7 प्रतिशत से घटकर 55.8 प्रतिशत हो गई है। उत्तर प्रदेश की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ यह दर 59.7 प्रतिशत से घटकर मात्र 34.6 प्रतिशत रह गई है। इसका अर्थ है कि प्रदेश के लगभग दो-तिहाई शिशु जीवन के पहले छह माह तक केवल माँ का दूध प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि माँ का दूध केवल पोषण ही नहीं बल्कि शिशु के मस्तिष्क के विकास, बेहतर बुद्धिलब्धि, रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा भविष्य में मोटापा, मधुमेह, एलर्जी, अस्थमा और अनेक दीर्घकालिक रोगों से सुरक्षा भी प्रदान करता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी सिद्ध हुआ है कि केवल स्तनपान कराने से अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम (एसआईडीएस) का जोखिम लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो सकता है। जन्म के बाद दूध न मिलने से पनपती है बीमारियां विशेषज्ञों ने बताया कि जिन शिशुओं को जन्म के बाद केवल माँ का दूध नहीं मिलता, उनमें अनेक गंभीर एवं जानलेवा बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इनमें नवजात सेप्सिस (रक्त संक्रमण), गंभीर दस्त एवं गैस्ट्रोएंटेराइटिस, निमोनिया एवं अन्य श्वसन संक्रमण, कान का संक्रमण (ओटाइटिस मीडिया), नेक्रोटाइजिंग एंटेरोकॉलाइटिस (विशेषकर समय से पूर्व जन्मे शिशुओं में), कुपोषण, आयरन की कमी से एनीमिया, बार-बार होने वाले संक्रमण, एलर्जी, एक्जिमा, अस्थमा, सीलिएक रोग, इन्फ्लेमेटरी बॉवेल डिजीज, टाइप-1 एवं टाइप-2 मधुमेह, बचपन में मोटापा, मेटाबोलिक सिंड्रोम तथा अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम (एसआईडीएस) जैसी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है। शोधों से यह भी संकेत मिलता है कि स्तनपान से वंचित बच्चों में भविष्य में कुछ प्रकार के बाल्यकालीन कैंसर, विशेषकर ल्यूकेमिया, का खतरा भी अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है। इसलिए जीवन के पहले छह माह तक केवल माँ का दूध शिशु के स्वस्थ विकास और रोगों से सुरक्षा का सबसे प्रभावी, सुरक्षित और प्राकृतिक उपाय है।