क़ुर्बानी का खून ज़मीन पर गिरने से पहले ही अल्लाह क़ुबूल फ़रमा लेता है:जाफरी
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर | तन्ज़ीम बरेलवी उलमा-ए-अहले सुन्नत के सदर मुहाफिज़-नामूस रिसालत हाफिज़ व क़ारी सैयद मोहम्मद फ़ैसल जाफ़री ने क़र्बानी की फज़ीलत का जिक्र करते हुए कहा कि पैगम्बरे इस्लाम हुज़ूर नबी करीम अलैहिस्सलाम ने इरशाद फरमाया कि अच्छे जानवरों की क़ुर्बानी करो क्यों कि क़यामत के दिन यह तुम्हारी सवारी बनेंगे तिर्मिज़ी शरीफ में उम्मुल मोमिनीन हज़रते आएशा सिद्दीक़ा रजि अल्लाहु अन्हा से मर्वी है कि रसूले काएनात अलैहिस्सलाम ने इरशाद फरमाया क़ुर्बानी के दिनों में इब्ने आदम का कोई अमल ख़ुदाए तआला के नज़दीक क़ुर्बानी से ज़्यादा प्यारा नहीं, और क़ुर्बानी किया हुआ जानवर क़यामत के दिन अपने सींगों, बालों व खुरों के साथ आएगा और क़ुर्बानी का ख़ून ज़मीन पर गिरने से पहले ही अल्लाह उस क़ुर्बानी को क़ुबूल फरमा लेता है
इब्ने माजा में हज़रते अबू हुरैरह रजि अल्लाहु अन्हु से रवायत की कि हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने फरमाया जिसमें क़ुर्बानी की वुसअत (यानी इतना माल हो कि उस पर क़ुर्बानी वाजिब हो) हो और वह क़ुर्बानी ना करे तो वह हमारी ईदगाह के क़रीब ना आए
सय्यिदुल मुरसलीन अलैहिस्सलाम ने अपनी चहीती बेटी खातूने जन्नत सय्यदा फातिमा ज़हरा रजि अल्लाहु अन्हा से फरमाया बेटी क़ुर्बानी के जानवर के पास खड़ी रहा करो क्यूँकि जब क़ुर्बानी के जानवर की गर्दन से ख़ून का पहला क़तरा ज़मीन पर गिरता है तो अल्लाह इसके सबब क़ुर्बानी करने वाले के तमाम गुनाह माफ फरमा देता है और क़ुर्बानी के वक़्त यह पढ़ा करो
मेरी नमाज़, मेरी इबादत, मेरी जिन्दगी और मेरी मौत सब अल्लाह ही के लिये है जो सारी मख़्लूक़ का पालने वाला है एक रवायत में है कि हुज़ूर अक़दस अलैहिस्सलाम ने इरशाद फरमाया क़ुर्बानियाँ सच्चे दिल से करो कि जो शख़्स अपने जानवर (क़ुर्बानी के लिये) को किब्ला रुख़ करता है तो क़ुर्बानी के जानवर के बाल और उसका ख़ून क़ुर्बानी करने वाले के लिये महफूज़ रखा जाता है, अल्लाह तआला इन चीज़ों की निगरानी फरमाता है, तुम थोड़ा ख़र्च करोगे लेकिन रब तुम्हें बदला बहुत ज़्यादा देगा मुस्लिम शरीफ में हज़रते उम्मे सलमा रजि अल्लाहु अन्हा से रवायत है कि ताजदारे कौनैन अलैहिस्सलाम ने फरमाया जब तुम जिलहिज्जा का चाँद देखो और तुम में से जो क़ुर्बानी करना चाहे तो उसको चाहिये कि वह बाल ना मुंडाय और ना ही क़ुर्बानी से पहले नाख़ुन तराशे
और नवीं जिलहिज्जा की फज्र से तेरहवीं जिलहिज्जा की अस्र तक हर नमाज़े फर्ज़ के बाद जो जमाअते मुस्तहिब्बा के साथ अदा की गई हो एक बार तकबीरे तशरीक़ बुलंद आवाज़ से कहना वाजिब और तीन बार अफज़ल है
याद रहेे कि तकबीरे तशरीक़ सलाम फेरने के फौरन बाद पढ़ी जाए तकबीरे तशरीक़ यह है(अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर लाइलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर वलिल्लाहिल हम्द)।