आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों की बड़ी खोज
- वैक्सीन को अधिक असरदार बनाने वाले ईपी67 के काम करने का तरीका आया सामने
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर | भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे अणु (मॉलिक्यूल) ईपी67 की कार्यप्रणाली का पता लगाया है, जो भविष्य में वैक्सीन को अधिक प्रभावी और सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित हुआ है।ईपी67 एक संभावित "एडजुवेंट" है।
एडजुवेंट वह पदार्थ होता है, जिसे वैक्सीन में मिलाया जाता है ताकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून रिस्पॉन्स) को और बेहतर बनाया जा सके। इस शोध के जरिए वैज्ञानिकों ने पहली बार यह समझा है कि ईपी67 मानव शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (इम्यून सेल्स) को किस प्रकार सक्रिय करता है। इससे भविष्य में अधिक सुरक्षित और प्रभावी वैक्सीन और प्रतिरक्षा प्रणाली आधारित नई दवाओं के विकास का रास्ता खुल सकता है। शरीर में कोई बैक्टीरिया या वायरस संक्रमण करता है, तो प्रतिरक्षा कोशिकाएं C5a नामक एक प्रोटीन बनाती हैं, जो शरीर को संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार करता है।ड C5a लंबे समय तक अधिक मात्रा में सक्रिय रहे, तो यह शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) और ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए शरीर में मौजूद एंजाइम संक्रमण खत्म होने के बाद इसे जल्दी निष्क्रिय कर देते हैं।आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों ने इसी प्राकृतिक प्रक्रिया से प्रेरणा लेकर C5a का एक छोटा और सुरक्षित रूप तैयार किया, जिसे ईपी67 नाम दिया गया। यह केवल दस अमीनो एसिड से बना है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के लाभकारी हिस्से को सक्रिय करता है, जबकि अनावश्यक सूजन को काफी हद तक रोकता है।ईपी67 मुख्य रूप से डेंड्रिटिक कोशिकाओं और मैक्रोफेज नामक प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सक्रिय करता है, जो शरीर में लंबे समय तक सुरक्षा प्रदान करने में मदद करती हैं। वहीं, यह उन कोशिकाओं को बहुत कम प्रभावित करता है, जो अत्यधिक सूजन का कारण बनती हैं। यही विशेषता इसे वैक्सीन बूस्टर के रूप में उपयोगी बनाती है।पहले किए गए पशु अध्ययनों में यह पाया गया था कि जब EP67 को विभिन्न वायरसों के खिलाफ तैयार की गई वैक्सीन के साथ प्रयोग किया गया, तो चूहों में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अधिक मजबूत हुई। इनमें कोविड-19 वायरस के खिलाफ विकसित वैक्सीन भी शामिल थीं। इसके अलावा, EP67 ने एमआरएसए (MRSA) जैसे एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया के संक्रमण से लड़ने की भी क्षमता दिखाई है।वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया कि ईपी67 शरीर में किस रिसेप्टर को सक्रिय करता है। उन्होंने पाया कि यह C5aR1 नामक रिसेप्टर से जुड़कर काम करता है। यह रिसेप्टर GPCR (जी-प्रोटीन कपल्ड रिसेप्टर्स) नामक बड़े समूह का हिस्सा है, जिन पर काम करके दुनिया की लगभग एक-तिहाई दवाएं अपना प्रभाव दिखाती हैं।शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में मानव कोशिकाओं पर परीक्षण कर यह पुष्टि की कि EP67, C5aR1 रिसेप्टर को सक्रिय करता है, लेकिन यह प्रक्रिया C5a की तुलना में अधिक नियंत्रित और सुरक्षित होती है। इसके बाद वैज्ञानिकों ने क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (Cryo-EM) तकनीक का उपयोग कर EP67 और रिसेप्टर के बीच बनने वाली संरचना की अत्यंत सूक्ष्म तस्वीरें प्राप्त कीं। इन तस्वीरों से पता चला कि EP67 एक विशेष हुक जैसी संरचना बनाकर रिसेप्टर से जुड़ता है और उसे सक्रिय करता है।इस महत्वपूर्ण जानकारी के आधार पर वैज्ञानिक अब EP67 की संरचना में आवश्यक बदलाव कर उसे और अधिक प्रभावी तथा स्थिर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। अगले चरण में इसकी मात्रा और उपयोग की विधि को लेकर प्री-क्लिनिकल परीक्षण किए जाएंगे।यह शोध आईआईटी कानपुर के जैविक विज्ञान एवं जैव अभियांत्रिकी विभाग के प्रोफेसर अरुण के. शुक्ला की प्रयोगशाला के नेतृत्व में किया गया है। यह अध्ययन जुलाई 2026 में PNAS पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। प्रोफेसर शुक्ला की टीम में अनु दलाल, मनीष यादव, सुधा मिश्रा, मणिशंकर गांगुली, शाची सिन्हा, नबरुण रॉय, दिव्यांशी तिवारी, देबदत्ता मुखर्जी, नीलांजना बनर्जी और रामानुज बनर्जी शामिल रहे।इस शोध में अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया के प्रोफेसर कॉर्नेलियस गाटी और ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के प्रोफेसर ट्रेंट वुडरफ की प्रयोगशालाओं का भी सहयोग मिला।इस परियोजना को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) से वित्तीय सहायता प्राप्त हुई। शोध में प्रयुक्त उच्च-रिजॉल्यूशन संरचना का निर्धारण आईआईटी कानपुर में स्थापित राष्ट्रीय क्रायो-ईएम सुविधा में किया गया, जिसे ANRF के सहयोग से स्थापित किया गया है।
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