राजमाता अहिल्याबाई होल्कर की मनाई गई पुण्यतिथि
-राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का जीवन त्याग, न्याय, धर्म और जनसेवा की अद्भुत मिसाल |
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर | पहरुए- दि सिविल सोसायटी के तत्वावधान में राजमाता अहिल्याबाई होल्कर की पुण्यतिथि के अवसर पर सिविल लाइंस स्थित कार्यालय में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में राजमाता अहिल्याबाई होल्कर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को स्मरण करते हुए उनके भारतीय संस्कृति, धर्म, समाजसेवा एवं जनकल्याण के क्षेत्र में किए गए अतुलनीय योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रबुद्ध नागरिकों एवं गणमान्य लोगों ने उपस्थित होकर राजमाता अहिल्याबाई होल्कर को श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ता एड. प्रदीप बाजपेई ने कहा कि राजमाता अहिल्याबाई होल्कर भारतीय इतिहास की उन महान विभूतियों में हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अपने अदम्य साहस, दूरदर्शिता, न्यायप्रियता और लोककल्याण की भावना से शासन की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जो आज भी प्रेरणादायी है।
चर्चा में भाग लेते हुए वक्ता राकेंद्र मोहन तिवारी ने बताया कि अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर क्षेत्र के चौंडी गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता मानकोजी शिंदे गांव के पाटिल थे। कहा जाता है कि बाल्यावस्था से ही अहिल्याबाई में धार्मिक आस्था, करुणा, अनुशासन और असाधारण बुद्धिमत्ता के गुण दिखाई देते थे।
चर्चा में भाग लेते हुए एड. गणेश शंकर पाण्डेय ने बताया कि उनका विवाह होल्कर राजवंश के युवराज खंडेराव होल्कर से हुआ। विवाह के बाद उन्होंने राजपरिवार के जीवन और प्रशासन को निकट से समझा। किंतु जीवन ने उन्हें लगातार कठिन परीक्षाओं से गुजारा। पति खंडेराव होल्कर के निधन के बाद उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना किया। बाद में उनके पुत्र मालेराव का भी निधन हो गया। परिवार पर आए इन लगातार आघातों के बावजूद अहिल्याबाई ने स्वयं को संभाला और अपने जीवन को व्यक्तिगत दुःख तक सीमित न रखकर प्रजा-सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
चर्चा में भाग लेते हुए दीना नाथ द्विवेदी ने बताया कि वर्ष 1767 में उन्होंने मालवा राज्य की बागडोर संभाली और लगभग तीन दशकों तक कुशलतापूर्वक शासन किया। उन्होंने महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया और वहां से एक ऐसे शासन की नींव रखी जिसमें न्याय, सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता, व्यापार, कृषि तथा जनकल्याण को विशेष महत्व दिया गया।
चर्चा में भाग लेते हुए अमित द्विवेदी ने बताया कि अहिल्याबाई का शासन इस बात का उदाहरण है कि एक शासक की महानता केवल उसके साम्राज्य के विस्तार से नहीं, बल्कि उसकी प्रजा के सुख और सुरक्षा से निर्धारित होती है। वे प्रजा की समस्याओं को गंभीरता से सुनती थीं और न्याय के प्रति अत्यंत सजग थीं।
चर्चा में भाग लेते हुए एड. राघवेन्द्र पाण्डेय ने बताया कि उन्होंने कृषि, व्यापार और सड़कों के विकास को प्रोत्साहित किया। यात्रियों और आम जनता की सुविधा के लिए कुएं, बावड़ियां, घाट, धर्मशालाएं और विश्रामगृह बनवाए। धार्मिक यात्राओं के मार्गों पर भी जनसुविधाओं का निर्माण कराया गया। इस प्रकार उनका शासन केवल राजकीय प्रशासन तक सीमित नहीं था, बल्कि सामान्य व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाने पर केंद्रित था।
चर्चा में भाग लेते हुए प्रमोद अग्रहरि (बॉर्डर) ने बताया कि राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का भारतीय संस्कृति के संरक्षण में योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने देश के विभिन्न तीर्थस्थलों और धार्मिक नगरों में मंदिरों के निर्माण, पुनर्निर्माण तथा जीर्णोद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चर्चा में भाग लेते हुए मनीष वर्मा ने बताया कि काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से लेकर देश के विभिन्न प्रमुख तीर्थस्थलों पर मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं के निर्माण तक उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, द्वारका, उज्जैन, हरिद्वार और अन्य धार्मिक स्थलों पर उनके द्वारा कराए गए निर्माण एवं जीर्णोद्धार कार्यों ने भारतीय तीर्थ-संस्कृति को मजबूती प्रदान की।
चर्चा में भाग लेते हुए सीए. कृष्ण नारायण पाण्डेय ने बताया कि अहिल्याबाई की विशेषता यह थी कि उनकी धार्मिक आस्था केवल व्यक्तिगत उपासना तक सीमित नहीं थी। उन्होंने अपनी आस्था को लोकसेवा और सांस्कृतिक संरक्षण से जोड़ दिया। मंदिरों के साथ-साथ उन्होंने यात्रियों की सुविधा के लिए घाट, धर्मशालाएं और जल-सुविधाएं भी विकसित कराईं।
चर्चा में भाग लेते हुए सचिन पाण्डेय ने बताया कि 18वीं शताब्दी जैसे कठिन सामाजिक और राजनीतिक दौर में एक महिला का स्वयं शासन की बागडोर संभालना और उसे सफलतापूर्वक चलाना अपने आप में असाधारण उपलब्धि थी। अहिल्याबाई ने यह सिद्ध किया कि नेतृत्व क्षमता का संबंध लिंग से नहीं, बल्कि दृष्टि, चरित्र, निर्णय क्षमता और जनसेवा की भावना से होता है।
चर्चा में भाग लेते हुए सीए. दीप कुमार मिश्र ने बताया कि उनका जीवन आज की महिलाओं और नई पीढ़ी के लिए विशेष रूप से प्रेरणादायी है। उन्होंने व्यक्तिगत विपत्तियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें अपनी शक्ति में परिवर्तित किया।
कार्यक्रम का सञ्चालन करते हुए सी.एम्.ए. अजय कुमार शर्मा ने बताया कि आज जब समाज में नैतिक मूल्यों, सुशासन और सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की चर्चा हो रही है, तब अहिल्याबाई होल्कर का जीवन और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने सत्ता को अधिकार के बजाय उत्तरदायित्व माना और राजकोष को व्यक्तिगत वैभव के लिए नहीं, बल्कि प्रजा के कल्याण के लिए उपयोग किया।
चर्चा में भाग लेते हुए मुख्य वक्ता श्याम देव सिंह ने बताया कि राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का जीवन हमें तीन महत्वपूर्ण संदेश देता है- विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, सत्ता में रहते हुए न्याय और समृद्धि में रहते हुए सेवा। यही कारण है कि लगभग ढाई शताब्दी बाद भी उनका नाम भारतीय इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए एड. अजय सिंह ने बताया कि राजमाता अहिल्याबाई होल्कर केवल मालवा की शासक नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति, धर्म, सेवा, सुशासन और मानवीय संवेदना की महान प्रतीक थीं। उनकी स्मृति को जीवित रखना और उनके आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समाज की जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता एड. अजय सिंह, संचालन एड. उमेश शुक्ला एवं धन्यवाद सी.ए. दीप कुमार मिश्रा ने दिया। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से सर्वश्री श्याम देव सिंह, राकेंद्र मोहन तिवारी, राघवेन्द्र पाण्डेय, अमित द्विवेदी, प्रदीप बाजपेई, गणेश शंकर पाण्डेय, दीना नाथ द्विवेदी, कृष्ण नारायण पाण्डेय, मनीष वर्मा, प्रमोद अग्रहरि, अजय कुमार शर्मा आदि उपस्थित थे।