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बरसीम व लूसर्न फसल से प्रोटीन बनाने की विधि पर फ्रैंक्सनेशन टेक्नोलॉजी पर दिया व्याख्यान
Updated: 8/5/2022 7:47:00 PM By Reporter- rajesh kashyap kanpur

बरसीम व लूसर्न फसल से प्रोटीन बनाने की विधि पर फ्रैंक्सनेशन टेक्नोलॉजी पर दिया व्याख्यान |
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर | आजादी का अमृत महोत्सव के व्याख्यान श्रृंखला में कृषि जीव रसायन विभाग चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर द्वारा साकभाजी फसलों के हरे फसल अवशेष से प्रोटीन बनाने की विधि पर फ्रैंकनेशन टेक्नोलॉजी पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान के मुख्य वक्ता डॉ जीपी श्रीवास्तव मानद महासचिव इंडियन सोसायटी आफ एग्रीकल्चरल बायोकेमिस्ट्स और पूर्व निदेशक शोध थे। व्याख्यान के प्रारंभ में डॉक्टर एचजी प्रकाश प्राध्यापक एवं अध्यक्ष ने व्याख्यान के मुख्य वक्ता डॉ जीपी श्रीवास्तव, संकाय सदस्य, एमएससी और पीएचडी छात्रों का स्वागत करते हुए उच्च शिक्षा में व्याख्यानों के महत्व के बारे में बताया तथा यह भी बताया कि छात्रों व संकाय सदस्यों में विषय विशेषज्ञता एवं क्षमता विकास में विशेष व्याख्यानों का बहुत महत्व है। डॉक्टर जीपी श्रीवास्तव ने साकभाजी फसलों के हरे फसल अवशेष, बरसीम व लूसर्न फसल से प्रोटीन बनाने की विधि पर फ्रैंक्सनेशन के सिद्धांत एवं उपयोग के बारे और महत्व पर विस्तृत विषय वस्तु से संकाय एवं छात्रों को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि साकभाजी फसलों के हरे फसल अवशेष जैसे आलू, चुकंदर, फूलगोभी और शलजम की हरी पत्तियां बथुआ, चारा तथा जलकुंभी जैसे पेड़ के पत्ते  जंगली पौधों की प्रजातियां से गुणवत्ता युक्त प्रोटीन प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने बताया कि उक्त पौधों से प्राप्त होने वाली प्रोटीन की पाचन गुणवत्ता अधिक होती है तथा जिसका उपयोग हम प्रतिदिन भोजन में कर सकते हैं। खासतौर से ऐसे व्यक्तियों जिनको पशु प्रोटीन से एलर्जी है इस हरी प्रोटीन का उपयोग गुणवत्तापूर्ण युक्त दुधारू पशुओं एवं मुर्गियों के दाने में भी किया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि विद्युत से संचालित हरित वनस्पति मिनसर का उपयोग करके प्रयोगशाला में साग भाजी फसलों के हरे फसल अवशेष बरसीम व लूसर्न फसल से प्राप्त फ्रैंक्सनेशन किया जा सकता है जो प्रति घंटे 6 से 8 किलोग्राम हरी प्रोटीन तैयार की जा सकती है। उन्होंने बताया की व्यवसायिक उत्पादन के लिए स्क्रू प्रेस मशीन का उपयोग किया जा सकता है। जो 100 किलोग्राम हरि प्रोटीन प्रति घंटे की दर से तैयार कर सकता है इस तकनीक से साग भाजी फसलों के हारे फसल अवशेष के उत्पाद तैयार हो सकते हैं जैसे रेशेदार अवशेष पत्ती, प्रोटीन सांद्र और डी प्रोटीन युक्त रस। उन्होंने बताया कि रेशेदार अवशेष से औसतन 11% प्रोटीन, 5% ईथर अर्क, 9% राख और 75% कार्बोहाइड्रेट युक्त अंश प्राप्त होते हैं।जिसका उपयोग मशरूम के उत्पादन के लिए मिट्टी में संशोधन के रूप में एथेनॉल /मैथनाल के उत्पादन के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि लीफ प्रोटीन उत्पाद में औसतन 50% प्रोटीन,10% ईथर का अर्क, 6% राख, 34% कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। उन्होंने कहा इन प्रमुख पोषक तत्वों के अलावा इस में क्लोरोफिल और जेनोफिल जैसे वर्णक और विटामिन ए व विटामिन ई भी पाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रौद्योगिकी के उपयोग से किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ चारा फसल उत्पादन डेरी और पोल्ट्री उत्पादन में काफी संभावनाएं हैं इस अवसर पर डॉ लल्लू सिंह, डॉ राकेश बाबू, डॉ नंदकुमार, डॉ अलका कटियार, डॉक्टर ममता राठौर और डॉक्टर दीपक कुमार उपस्थित रहे। अंत में धन्यवाद डॉ नंदकुमार सहायक प्राध्यापक ने दिया।


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