डायरिया होने पर ओआरएस देना ही सबसे बडा बचाव: डाॅ जे.के. गुप्ता
- ब्रदेश में लगभग आधे बच्चे दस्त होने पर ओआरएस से है वंचित
- वर्ष 2030 तक दस्त से पीड़ित 70 फीसदी बच्चो को ओआरएस उपलब्ध कराने का लक्ष्य
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर। विश्व ओआरएस सप्ताह के उपलक्ष्य में एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स कानपुर द्वारा जी.एस.वी.एम. मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग में एक प्रेस वार्ता आयोजित की गई। प्रेस वार्ता में एकेडमी के अध्यक्ष डॉ. जे. के. गुप्ता, सचिव डॉ. शैलेन्द्र गौतम, डॉ. अरुण आर्या ने ओआरएस के महत्व के बारे में जानकारी दी। डॉ. जे. के. गुप्ता ने बताया कि दस्त (डायरिया) से आज भी बच्चों की मृत्यु के सबसे बड़े कारणों में से एक है, जबकि इसका सबसे सरल, सुरक्षित एवं प्रभावी उपचार ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ओआरएस) और जिंक है। उन्होंने कहा कि समय पर ओआरएस और जिंक देने से लगभग 95 फीसदी बच्चों की जान बचाई जा सकती है तथा अनावश्यक अस्पताल में भर्ती होने से भी बचा जा सकता है।प्रेसवार्ता के दौरान पूर्व बाल रोग विभागध्यक्ष डाॅ ए.के.आर्या ने बताया कि विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष दस्त से लगभग 12 लाख लोगों की मृत्यु होती है, जिनमें 4.43 लाख से अधिक पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे शामिल हैं। पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में दस्त मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। उन्होंने बताया कि भारत में प्रतिवर्ष दस्त से लगभग 4.62 लाख लोगों की मृत्यु होती है। देश में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की कुल मृत्यु में 8 से 13 प्रतिशत मौतें दस्त एवं उससे होने वाले निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) के कारण होती हैं। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि एक गंभीर समस्या यह भी है कि अनेक अभिभावक बिना चिकित्सकीय सलाह के बच्चों को एंटीबायोटिक या दस्त रोकने वाली दवाइयाँ देना शुरू कर देते हैं। उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार लगभग 72 प्रतिशत मामलों में बच्चों को अनावश्यक एंटीबायोटिक दवाएँ दी जाती हैं, जबकि अधिकांश तीव्र दस्त में इनकी आवश्यकता नहीं होती। इससे दवाओं के प्रति प्रतिरोध बढ़ता है और बच्चे को अनावश्यक दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है।बाल रोग विभागध्यक्ष डॉ. शैलेन्द्र गौतम ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य समुदाय ने वर्ष 2030 तक दस्त से पीड़ित कम से कम 70 प्रतिशत बच्चों को ओआरएस उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया है। भारत में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस -5) के अनुसार दस्त से पीड़ित 60.6 प्रतिशत बच्चों को ओआरएस दिया जाता हैए जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा केवल 50.7 प्रतिशत है। इसका अर्थ है कि प्रदेश में लगभग आधे बच्चे दस्त होने पर भी ओआरएस से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने आगे बताया कि भारत में केवल 23.6 प्रतिशत बच्चों को ओआरएस के साथ जिंक दिया जाता है। जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा लगभग 13 प्रतिशत है। वहीं उत्तर प्रदेश में लगभग 17.6 प्रतिशत बच्चों को दस्त होने पर कोई उपचार ही नहीं मिलता। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। इसी क्रम में डॉ. अमितेश यादव ने अभिभावकों से अपील की कि बच्चे को दस्त होने पर घबराने के बजाय तुरंत ओआरएस देना प्रारंभ करें। चिकित्सक की सलाह पर 14 दिनों तक जिंक की दवा दें, बच्चे को स्तनपान एवं सामान्य भोजन जारी रखें तथा निर्जलीकरण के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत अस्पताल पहुँचें।एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स लगाएगा जागरूकता कैंपएकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स कानपुर द्वारा 25 जुलाई से 31 जुलाई 2026 तक पूरे शहर में विश्व ओआरएस सप्ताह व्यापक जनजागरूकता अभियान के रूप में मनाया जाएगा। इस दौरान विभिन्न अस्पतालों, स्वास्थ्य केन्द्रों, विद्यालयों तथा सार्वजनिक स्थानों पर ओआरएस जागरूकता कार्यक्रम, ओआरएस कॉर्नर, जनजागरण अभियान, चिकित्सकों एवं केमिस्टों के साथ बैठकें, पोस्टर एवं चित्रकला प्रतियोगिताएँ, जनसंपर्क कार्यक्रम तथा अन्य गतिविधियाँ आयोजित की जाएँगी।