कोलांजियोस्कोपी से बड़ी पित्त पथरी का उपचार, बड़े ऑपरेशन से बचाव
- कार्यशाला में ईआरसीपी के जरिए 2 से 2.5 सेंटीमीटर की पथरी निकाली गई
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर। पित्त नली में फंसी बड़ी पथरी के जटिल मामलों में कोलांजियोस्कोपी आधारित उपचार को प्राथमिकता देते हुए जीएसवीएम पीजीआई के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग में कोलांजियोस्कोपी वर्कशॉप आयोजित की गई। कार्यशाला में ऐसे मरीजों का उपचार किया गया, जिनकी पित्त नली में करीब 2 से 2.5 सेंटीमीटर की पथरी फंसी थी और कई प्रयासों के बावजूद ईआरसीपी से इसे निकाला नहीं जा सका था।विशेषज्ञों ने कोलांजियोस्कोपी के साथ इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक लिथोट्रिप्सी तकनीक का इस्तेमाल कर पथरी को छोटे टुकड़ों में तोड़ा। इसके बाद ईआरसीपी के माध्यम से पथरी के टुकड़ों को बाहर निकाला गया। चिकित्सकों के अनुसार, इस तकनीक से चुनिंदा जटिल मामलों में बड़े ऑपरेशन की आवश्यकता को टालने में मदद मिल सकती है।विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार ने बताया कि कोलांजियोस्कोपी में कैमरे से युक्त बेहद पतली और लचीली ट्यूब को पित्त नली के अंदर पहुंचाकर उसकी तस्वीरें देखी जाती हैं। यह तकनीक पित्त नली की बड़ी पथरी, संकुचन, अवरोध और संदिग्ध ट्यूमर की जांच में उपयोगी है। इसके जरिए पित्त नली के अंदर से बायोप्सी भी ली जा सकती है, जिससे संदिग्ध कैंसर की जांच में सहायता मिलती है।वर्कशॉप में डॉ. ध्रुव ठाकुर, डॉ. सत्यम सिंह और डॉ. आकाश शर्मा सहित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग की टीम मौजूद रही। आयोजन मेडोरा मेडिटेक प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से हुआ। प्राचार्य डॉ. संजय काला ने कार्यशाला के सफल आयोजन पर विभाग को बधाई दी।