हीमोफिलिया सोसाइटी ने आयोजित की संगोष्ठी
- शहर में 550 मरीज पंजीकृत, 125 मरीजो के परिवार ने किता प्रतिभाग
- प्रति मरीज 2 लाख का खर्च,मिलता केवल 48 हजार
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर। हीमोफिलिया सोसाइटी, कानपुर द्वारा रविवार को होटल विजय इन्टरनेशनल, खलासी लाइन, में एक संगोठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का शुभारंभ हीमोफिलिया सोसाइटी के प्रवीण सेठ, सचिव राजेश भसीन व कोषाध्यक्ष डॉ सुनील तेनेजा ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस संगोष्ठी में सुप्रसिद्ध डॉक्टरों ने अपने विचार साझा किए। डॉ सुनील तनेजा ने बताया कि हीमोफिलिया एक आनुवंशिक बीमारी है जो अभी तक लाइलाज है। इस बीमारी पर शोध की प्रक्रिया जारी है। उन्होंने बताया कि हीमोफिलिया एक आनुवंशिक विकार है, जिसमें शरीर की रक्त का थक्का बनाने की क्षमता कम हो जाती है। सामान्य तौर पर जब हमें चोट लगती है, तो रक्त में मौजूद कुछ तत्व मिलकर एक 'जाल' जैसा बना देते हैं जिससे खून बहना रुक जाता है, लेकिन हीमोफिलिया के मरीजों में यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है। उन्होंने बताया कि इस बीमारी का लक्षण जैसे चोट लग जाने पर लंबे समय तक खून बहना, बिना किसी स्पष्ट कारण के नाक से खून आना, जोड़ों (घुटनों, कोहनियों) में सूजन और दर्द, जो आंतरिक रक्तस्राव के मुख्य कारण हो सकते है। इसके साथ ही त्वचा पर नीले निशान पड़ना भी होता है। यह बीमारी मुख्य रूप से (खून का थक्का जमाने वाले प्रोटीन) की कमी के कारण होती है। इसके दो मुख्य प्रकार हैं:
हीमोफिलिया A: इसमें 'फैक्टर (8) की कमी होती है। यह सबसे आम प्रकार है। जबकि हीमोफिलिया बी इसमें 'फैक्टर (9) की कमी होती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में इसका कोई पूर्ण इलाज नहीं है, लेकिन इसे प्रभावी ढंग से मैनेज किया जा सकता है। फैक्टर रिप्लेसमेंट थेरेपी जो मरीज को इंजेक्शन के जरिए वह खास क्लॉटिंग फैक्टर दिया जाता है जिसकी उसके शरीर में कमी है। इस दौरान मुख्य रूप से डा० अवध दुबे, डा० संजय रस्तोगी, डा० सुनील तनेजा, डा० बी० एन० त्रिपाठी, शप्रवीन सेठ, राजेश भसीन, डॉ ए के आर्य, डॉ एस के गौतम समेत सोसाइटी के पदाधिकारी मौजूद रहे।
- सरकार से मिलता है कम अनुदान
डॉ तनेजा ने बताया कि हमारी संस्था सप्ताह में एक दिन निःशुल्ल जांच ऐसे मरीजों की करती है। हालांकि अभी तक कानपुर में ऐसे 550 मरीज पंजीकृत है जबकि पूरे उत्तर प्रदेश में इसका आंकड़ा 4800 के लगभग है। प्रत्येक मरीज पर तकरीब 2 लाख का खर्च आता है। जिसके सापेक्ष केंद्र सरकार 400 करोड़ व राज्य सरकार 18 करोड़ जा बजट देती है, जो वर्तमान में प्रति मरीज बहुत कम है।