डेली कंट्रोलर ट्रीटमेंट, सिर्फ़ आराम नहीं, अस्थमा में बेहतर नतीजों का सहारा है
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर | वर्ल्ड अस्थमा डे 2026 पर जब (ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा यानी अस्थमा के लिए वैश्विक पहल) एंटी-इंफ्लेमेटरी इनहेल्ड ट्रीटमेंट तक पहुंच की ज़रूरत पर ध्यान दिला रहा है,1 विशेषज्ञों ने भारत में अस्थमा केयर में एक बड़ा अंतर बताया है। मोटे तौर पर जरूरत देखभाल की उपलब्धता से कहीं ज़्यादा है। सिप्ला की ‘बेरोक ज़िंदगी’ और ‘टफ़ीज़’ जैसी पहल समय पर और सही देखभाल पाने के तरीकों को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता फैलाने की कोशिशों को आगे बढ़ा रही हैं। 75% लोग बताए गए इनहेलर का इस्तेमाल नहीं करते हैं। इससे भारत के अस्थमा केयर इकोसिस्टम में कमी का पता चलता है, जहाँ इलाज तो मौजूद हैं लेकिन उनका कम इस्तेमाल होता है। यह इस बात पर ज़ोर देता है कि इनहेलर के इस्तेमाल से जुड़ी गलतफहमियों को दूर करने के लिए जागरूकता फैलाने की कोशिशों को सशक्त करने की ज़रूरत है। दवाइयों के बेहतर इस्तेमाल का प्रचार-प्रसार करने के साथ अस्थमा को सिर्फ़ इसके लक्षणों की बजाय एक पुरानी बीमारी के तौर पर मैनेज करने तथा बताई गई एंटी-इंफ्लेमेटरी इनहेल्ड थेरेपी का लगातार इस्तेमाल करते रहना आवश्यक है।लक्षण-आधारित देखभाल से आगे बढ़ने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए, डॉ. चन्द्र शेखर, पल्मोनोलॉजिस्ट ने कहा “अस्थमा फेफड़ों की एक आम पुरानी बीमारी है जो सांस की नली में सूजन की वजह से होती है, और इसकी पहचान आमतौर पर घरघराहट, सांस लेने में तकलीफ, सीने में जकड़न और खांसी जैसे लक्षणों से होती है, जो समय के साथ और गंभीरता में अलग हो सकते हैं।
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