फसल अवशेष प्रबंधन पर पाँच दिवसीय कृषक प्रशिक्षण का समापन
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर | सीएसए के अधीन संचालित कृषि विज्ञान केंद्र दिलीप नगर में फसल अवशेष प्रबंधन पर पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन समारोह का आयोजन किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम का विषय मशीनो द्वारा फ़सल अवशेषों का प्रबंधन था जिसमें पूरे कानपुर देहात जिले के 25 किसानों ने भाग लिया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को फ़सल अवशेषों के प्रबंधन की विभिन्न तकनीकों के बारे में प्रशिक्षण देना था।कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र बांदा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर श्याम सिंह ने बतौर मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। उन्होने फ़सल अवशेषों से बनाए जा सकने वाली कंपोस्ट को बनाने की विधि के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि खेत में पराली को आग लगाने से मिट्टी में विद्यमान् सूक्ष्म जीवों और केंचुओ की संख्या में बहुत नुक़सान होता है जिससे मिट्टी की उर्वरता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा उन्होंने फ़सल अवशेष प्रबंधन के अन्य विकल्पों जैसे पराली से बायो गैस उत्पादन, मशरूम उत्पादन, पैकिंग सामग्री के रूप में फसल अवशेषों के उपयोग आदि पर भी प्रकाश डाला। केंद्र के प्रभारी डॉक्टर अजय कुमार सिंह ने बताया कि गेहूं-धान फ़सल चक्र में काफ़ी मात्रा में फसलों अवशेष उत्पन्न होते हैं। गेहूं की प्रणाली पशुओं के चारे के तौर पर इस्तेमाल की जाती है व इसका प्रबंधन करने के लिए डेढ़ महीने का समय भी मिल जाता है इसलिए गेहूं की पराली प्रबंध में समस्या नहीं आती। लेकिन धान की लंबी अवधि की किस्मों की कटाई और गेहूं की बुवाई में सिर्फ़ 15 दिन का ही समय मिलता है व पराली के चारे के रूप में कम इस्तेमाल से धान की पराली प्रबंधन एक चुनौती हैं। उन्होंने बताया की धान की कम अवधि की किस्मों जैसे पी बी 1509, पी बी 1692 आदि की बुआई से धान की पराली प्रबंधन के लिए लगभग एक महीने का पर्याप्त समय मिल जाता है इसलिए उन्होंने किसानों से अपील की कि वे जल संरक्षण तथा पराली न जलाने के लिए खुद भी प्रेरित हो व और साथी किसानों को भी जागरूक करें ताकि हम होने वाली पीढिय़ों के लिए एक वातावरण बचा सके।केंद्र के वैज्ञानिक डॉक्टर खलील खान ने पराली के यथासंभव प्रबंधन द्वारा मृदा स्वास्थ्य पर होने वाले सकारात्मक प्रभाव के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने मृदा संरक्षण व गेहूं की बुवाई में इस्तेमाल होने वाली मृदा संरक्षण केंद्रित मशीनों जैसे ज़ीरो ट्रिल ड्रिल, हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, स्मार्ट सीडर के बारे में बताया व उनके प्रयोग से मृदा के भोतिक गुणों में होने वाले सुधार के बारे में विस्तार से बताया। वेज्ञानिक डॉ दीपक मिश्रा ने विभिन्न मशीनों के द्वारा किए जाने वाले पराली प्रबंधन से होने वाले आर्थिक लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी व उन्हे पराली से होने वाले विभिन्न व्यवसाओ व उनमें मिलने वाली सब्सिडी के बारे में बताया। इस मौके पर डॉ राजेश राय, डॉ अरुण कुमार सिंह, उपेन्द्र कुमार सिंह, दिव्यांशु यादव, शुभम यादव प्रगतिशील किसान चरन सिंह, अशोक, जय सिंह, आदि ने भी अपने विचार साझा किए।
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