मिट्टी के रंग: कला और संस्कृति का पाँच दिवसीय मना उत्सव |
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर । एस. जे. महाविद्यालय, रमईपुर के चित्रकला विभाग द्वारा 22 अक्टूबर से 28 अक्टूबर 2026 तक “मिट्टी के रंग” विषय पर पाँच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय लोककला, मिट्टी-आधारित कला और पारंपरिक चित्रण के नए आयामों से अवगत कराना रहा। महाविद्यालय रमईपुर, कानपुर नगर में स्थित है। शुभारंभ एवं उद्घाटन
कार्यशाला का शुभारंभ प्रबंधन समिति के सदस्य डॉ. अंकित कटियार के मार्गदर्शन में हुआ। उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि एवं प्रसिद्ध चित्रकार डॉ. मिठाई लाल, निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स, छत्रपति साहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
मुख्य अतिथि के विचार
मुख्य अतिथि डॉ. मिठाई लाल ने विद्यार्थियों की कलात्मक प्रतिभा, परिश्रम और लगन की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाएँ विद्यार्थियों को अपनी सृजनात्मक क्षमता प्रदर्शित करने, कला-दृष्टि विकसित करने और कला के क्षेत्र में नई संभावनाओं को खोजने का अवसर देती हैं।
उन्होंने विशेष रूप से मिट्टी से निर्मित दीयों, मूर्तियों तथा म्यूरल पेंटिंग में देवी-देवताओं के जीवंत और भावपूर्ण चित्रण की प्रशंसा की। उनके अनुसार मिट्टी केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण जीवन, आस्था और लोक संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है। चित्रकला विभाग का उद्देश्य
कार्यशाला के दौरान चित्रकला विभागाध्यक्षा डॉ. पूर्णिमा ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि भारतीय लोककलाएँ हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर हैं और इनका संरक्षण तथा विकास युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि “मिट्टी के रंग” जैसी कार्यशाला विद्यार्थियों को पारंपरिक कला के साथ आधुनिक अभिव्यक्ति को जोड़ने का अवसर देती है। इससे उनकी कलात्मक समझ, निरीक्षण क्षमता और रचनात्मक आत्मविश्वास का विकास होता है। कार्यशाला की विशेषता
कार्यशाला में विद्यार्थियों ने मिट्टी के दीये, मूर्तिकला और म्यूरल पेंटिंग के माध्यम से देवी-देवताओं, लोकजीवन तथा सांस्कृतिक प्रतीकों को अपनी कला में उतारा। प्रस्तुत कृतियों में मिट्टी की स्थानीयता, रंगों की प्रामाणिकता और भारतीय लोक परंपरा की गहरी झलक देखने को मिली।
समापन पाँच दिवसीय इस कार्यशाला ने विद्यार्थियों को केवल कला-अभ्यास ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर भी दिया। आयोजन से यह संदेश स्पष्ट रहा कि मिट्टी के रंगों में भारतीय समाज की आस्था, श्रम, सौंदर्यबोध और सृजनशीलता समाई हुई है।